रवींद्रनाथ टैगोर की आत्मकथा और उनके जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण बातें। Autobiography of Rabindranath Tagore

  • रवींद्रनाथ टैगोर की आत्मकथा
  • रवींद्रनाथ टैगोर का अपने परिवार के साथ संबंध है।
  • रवींद्रनाथ टैगोर की रुचि किस प्रकार थी ।
  • रविंद्र नाथ के विचार किस प्रकार थे।
  • रविंद्र नाथ टैगोर का दुखद समय कब रहा ।
  • रविंद्र नाथ के विचारों में भिन्नता महात्मा गांधी की तुलना में।

रविंद्र नाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 में हुआ था । इनके पिता देवेंद्र नाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था। रविंद्र नाथ टैगोर के पिता देवेंद्र नाथ टैगोर एक आध्यात्मिक वाले व्यक्ति थे ये राजा राममोहन राय से बहुत प्रभावित थे। इनके दादाजी द्वारिका नाथ टैगोर जो बहुत फेमस व्यक्ति और एक धनी व्यक्ति थे।

रवींद्रनाथ टैगोर का अपने परिवार के साथ संबंध है।
रविंद्र नाथ टैगोर अपने माता-पिता के 14 वी संतान थे । इनके सबसे बड़े भाई द्विजेंद्रनाथ नाथ जो की एक है दार्शनिक और कवि थे सत्येंद्र नाथ टैगोर जिन्होंने यूरोपीय भारतीय सिविल सेवा पास की सबसे पहले । इनकी बहन स्वर्णकुमारी जो की एक नोवलिस्ट थी।
ज्योतिरींद्रनाथ टैगोर जो की एक म्यूजिशियन थे जिनकी पत्नी कादंबरी देवी जिनका लगाओ रविंद्र नाथ टैगोर के प्रति बहुत था।
रविंद्र नाथ टैगोर के जीवन में इसके भाई हेमेन्द्रनाथ टैगोर का बहुत बड़ा सहयोग रहा था। जिन्होंने रविंद्र नाथ टैगोर को तैरना सिखाया , भूगोल, इतिहास, साहित्य, गणित, संस्कृति और इंग्लिश जैसे विषयों पर पकड़ बनवाया जिससे उनके जीवन में बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा।

रवींद्रनाथ टैगोर की रुचि किस प्रकार थी ।
देवेंद्र नाथ अपने बेटे रविंद्र नाथ टैगोर को एक वकील बनना चाहते थे इसलिए उन्होंने रविंद्र नाथ को इंग्लैंड भेजो 1878 में।
पर रविंद्र नाथ ने 1880 पर भारत को वापस आ गए क्योंकि उनकी रुचि साहित्य विषयों पर ज्यादा थी जिसे उन्होंने भारत आकर फैलाया किया और अपनी रुचि पर काम किया।
रवींद्रनाथ का मानना था कि संगीत हमारे सभी परेशानों को खत्म कर देता है इसलिए यह अपना काफी समय संगीत को देते थे।

1880 के समय इन्होंने दो पद्य नाटक जो की बंगाली में थे । वाल्मीकि प्रतिभा और काल मृगाया जिन्हें इन्होंने प्रकाशित किया । 1882 में इन्होंने दोबारा पद्य नाटक प्रकाशित किया जिनमें रूद्र चक्र और संध्या संगीत थे। जिनसे बंकिम चंद्र चटर्जी प्रभावित हुए।

1883 में उनकी शादी मृणाली देवी से हुई । उस समय 1884 में ज्योति नाथ टैगोर की पत्नी मृत्यु हो जाती हैं जो कि उनके बचपन से ही एक अच्छे साथी की तरह उनके साथ रहती थी । 1891 में उनके सबसे प्रसिद्ध पद्य नाटक चित्रांगडा को प्रकाशित किया गया ।

रविंद्र नाथ के विचार किस प्रकार थे।
रविंद्र नाथ टैगोर मानववाद की बात करते थे यह महात्मा गांधी की तरह अहिंसा की बात करते थे। ये मूर्ति पूजा पर ज्यादा विश्वास नहीं करते थे पर ईश्वरी शक्ति की बात कहा करते थे जो प्रत्येक मानव में होती है जिसे जानना होगा तभी ये अपनी कविताओं के जरिए प्यार फैलाने की बात किया करते थे ।

शांतिनिकेतन जो की एक भूमि थी जिन्हें उनके पिता ने इनको पैदा होने के बाद उनके नाम कर दिया था । पर ये केवल पवित्र आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए प्रयोग कर सकते थे जहां विश्व भारतीय यूनिवर्सिटी को खोलना चाहते थे जहां भारतीय संस्कृत के साथ शिक्षा पर बल देने की बात कही गई और प्रकृति के साथ शिक्षा पर बल देने की बात कही ।
इन्होंने इस यूनिवर्स्टी को बनाने के लिए अपने कविताओं की कॉपीराइट बेची ताकि धन को इकट्ठा कर सके।

रविंद्र नाथ टैगोर का दुखद समय कब रहा ।
1902 में उनके पास इनकी परिवार में उनकी पत्नी और पिता का देहांत हो गया। 1905 में बंगाल विभाजन हुआ जिससे इन्हें बहुत दुख हुआ। जिसके बाद इन्होने रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया और उस समय सभी को यह बताएं कि हम अलग-अलग नहीं है तथा दुख को जताया ।

रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा नोवल भी लिखे गए जो की चोखेर बाली और गोरा थे। जिसमे इन्होंने बताया कि ब्रह्मो समाज की बात कही और ईश्वरी ज्ञान की बात कही ।
इनके द्वारा जनगणना मन भी लिखा गया। रविंद्र नाथ टैगोर ने लिखा जिसे सबसे पहले 26 वे राष्ट्रीय कांग्रेस सम्मेलन में गाया ।
W. B. Yeatts ने रवींद्रनाथ की कविता को पड़ा जिससे वह इतना खो गए इनकी पंक्तियों में । इसके बाद 1913 में रविंद्र नाथ टैगोर को गीतांजलि के लिए नोबेल प्राइज दिया गया ।
और जिसके बाद में नाइटहुड की उपाधि दी गई ।

रविंद्र नाथ के विचारों में भिन्नता महात्मा गांधी की तुलना में।
महात्मा गांधी मूर्ति पूजा को मानते थे तथा वही रविंद्र नाथ का कहना था कि हममें सभी के अंदर ईश्वर शक्ति है बस उसे जगाना चाहिए ।

1920 के बाद इन्होंने अलग अलग देशों का दौरा किया जहां इन्होंने धन इकट्ठा किया। इसके बाद उन्होंने विश्व भारतीय विश्वविद्यालय बनाया । 7 अगस्त 1940 में इन्होंने यूनिवर्स ऑफ ऑक्सफोर्ड से इन्होंने डॉक्ट्रिरेट की उपाधि मिली । 7 अगस्त 1941 में इनका निधन हो गया।

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