स्वामी विवेकानंद के जीवन के बारे में संक्षिप्त में जानकारी । Life story of Swami Vivekananda।

  • स्वामी विवेकानंद के बारे में संक्षिप्त ।
  • विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन किस प्रकार रहा
  • रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात किस प्रकार हुई
  • नरेंद्र नाथ से विवेकानंद नाम की शुरुवात।
  • अन्य देशों में विवेकानंद की यात्रा।
  • स्वामी विवेकानंद का भारत वासी।

विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन किस प्रकार रहा
इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा 1871 में 8 साल की उम्र में ईश्वर चंद्र विश्वविद्यालय के मेट्रो पॉलिटन इंस्टीट्यूशन में दाखिला लिया । 1879 में कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया । ये धार्मिक विषयों एवं सामाजिक विज्ञान , कला जैसे विषयों के शौकीन रखते थे 1884 में इन्होंने अपने स्नातक की डिग्री पूरी कर दी । तथा इन्होंने कई सारे धार्मिक पुस्तको , उपनिषद और भागवत गीता का अध्ययन किया । 1980 में इन्होंने केशव चंद्र सेन के साथ साधारण ब्रह्ममो समाज से जुड़े ।

स्वामी विवेकानंद के बारे में संक्षिप्त ।
विवेकानंद का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था । स्वामी विवेकानंद का जन्म एक बंगाली परिवार में हुआ था जो की कोलकाता में 12 जनवरी 1863 को मकर संक्रांति के उत्सव के दौरान पैदा हुए थे । इनके पिता विश्वनाथ दत्त जो कोलकाता के उच्च न्यायालय में वकील थे इनकी माता भुवनेश्वरी देवी जो एक ग्रहणी थी । विवेकानंद का बचपन से ही धार्मिक चीजों के प्रति के लगाओ रहता था ।
Note – इनके जन्म दिवस पर 12 जनवरी को हम हर साल राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाते हैं

रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात किस प्रकार हुई
1981 में इनके स्कॉटिश चर्च कॉलेज के प्रिंसिपल ने इन्हें रामकृष्ण से मिलने को कहा जहां ये पहली बार रामकृष्ण से मिले। तथा जब ये 1882 में ये दूसरी बार रामकृष्ण से मिले जिससे उनके जीवन में काफ़ी प्रभाव पडा। ब्रह्म समाज के सदस्य के रूप में विवेकानंद ने रामकृष्ण की काली पूजा का विरोध किया। परन्तु रामकृष्ण द्वारा उन्हें सहजता से उत्तर दिए जाने पर ये पूर्णतया संतुष्ट हो गए।
1884 में विवेकानंद के पिता की मृत्यु के बाद उन्हे गरीबी का सामना करना पड़ा जिसके बाद एक दिन नरेंद्र ने रामकृष्ण से अपने परिवार की स्थिति के बारे में देवी से प्रार्थना करने को कहा रामकृष्ण द्वारा यह कार्य स्वयं करने को कहा नरेंद्र से इसके बाद नरेंद्र के मन में देवी से सच्चे ज्ञान और भक्ति की प्रार्थना करने लगे और धीरे-धीरे सब कुछ त्यागने लगे यह देखकर रामकृष्ण ने उन्हें अपना शिष्य बना दिया ।

1885 में रामकृष्ण को गले का कैंसर हो गया था । जिसके बाद ये कोलकाता से कोसीपोर में चले गए जहां नरेंद्र और अन्य शिष्यों ने रामकृष्ण की सेवा की। नरेंद्र ने अपनी आध्यात्मिक शिक्षा जारी रखी। रामकृष्ण से इन्हें गेरुआ वस्त्र प्राप्त हुए । जिससे बाद उनका पहला मठ वासी संघ बना । जिससे इन्हें यह शिक्षा मिली कि मनुष्य की सेवा ईश्वर की पूजा से ज्यादा प्रभावशील है। 16 अगस्त 1886 में रामकृष्ण की मृत्यु हो गई। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद नरेंद्र ने कुछ शिष्यों के साथ मिलकर मठ की स्थापना की। धन के अभाव के कारण उन्हें भिक्षा भी मांगनी पड़ी । 1888 में मठ छोड़ने के बाद ये पूरे भारत में घूमने लगे ।
ये एक भटकते भिक्षुओं की तरह धार्मिक प्रचार और हिंदू धार्मिक जीवन जीने लगे । जिनके पास ना ही आवास था । उन्होंने लोगों की पीड़ा और गरीबी के प्रति सहानुभूति विकसित की और देश के प्रति उत्थान की संकल्पना की ।

नरेंद्र नाथ से विवेकानंद नाम की शुरुवात।
खेतड़ी के अजीत सिंह द्वारा विवेकानंद नाम का सुझाव दिया। इसके बाद इन्हें स्वामी विवेकानंद नाम से जाने लगे।

अन्य देशों में विवेकानंद की यात्रा।
अपनी यात्रा विवेकानंद ने 31 मई 1893 में अपनी यात्रा अन्य देशों की ओर कर दी । जहां ये जापान, USA , कनाडा का दौरा किया ।
ये 30 जुलाई 1893 में शिकागो पहुंचे
जहां सितंबर में 1893 में धर्म संसद होनी थी।इन्हें ब्रह्म समाज और हिंदू धर्म के प्रतिनिधित्व के रूप में आमंत्रित किया । इन्होंने 11 सितंबर 1893 में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए शिकागो में भाषण दिया जिसकी शुरूआत इन्होंने अमेरिकी भाई –बहनों से किया। उनके भाषण से सभी लोगों में हिंदू धर्म से प्रति जागरूकता मिली ।
इसके बाद ये अमेरिका के कहीं जगहो का दौरा किया। हजार लोगों के जीवन में धर्म के विस्तार के लिए विचार खोल , 1895 तक इन्होंने या कार्यक्रम जारी रखा जिसके बाद इनके स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ने लगा इसके बाद उन्होंने वेदांत और योग में मुक्ति की कक्षाएं शुरू की। 1896 में इन्होंने दूसरी बार ब्रिटेन का दौरा किया और अपने कार्यों को जारी रखा 1896 में इनकी पुस्तक राज योग प्रकाशित हुई जो की एक सफल पुस्तक रही ।

स्वामी विवेकानंद का भारत वासी।
1897 में ये भारत आए और जिनके बाद उन्होंने 1 May 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इन्होंने आर्थिक रूप से लोगो की सहायता की और इन्होंने रामकृष्ण मिशन पर कहीं स्कूल, कॉलेज , हॉस्पिटल की स्थापना की । जो आज भी चल रहे हैं। 4 जुलाई 1902 में जब ये ध्यान कर रहे थे उस समय इनकी मृत्यु हो गई।

स्वामी विवेकानंद के विचार – ”उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए

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